क्या देहरादून के ‘अशोक खेमका’ साबित होंगे सविन बंसल?
देहरादून। प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही नाम की चर्चा सबसे ज्यादा है— सविन बंसल। देहरादून के जिलाधिकारी के रूप में उनकी कार्यशैली ने जहाँ आम जनता के बीच एक नई उम्मीद जगाई है, वहीं सत्ता और रसूख के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सवाल उठने लगा है कि क्या सविन बंसल उत्तराखंड के ‘अशोक खेमका’ बनने की राह पर हैं, जिनकी ईमानदारी का इनाम उन्हें बार-बार होने वाले तबादलों से मिला?
ग्राउंड जीरो पर एक्शन और जनसुनवाई का नया अंदाज
जिलाधिकारी सविन बंसल ने पदभार संभालते ही जिस तरह से ‘फाइल कल्चर’ को छोड़कर ‘फील्ड कल्चर’ अपनाया, उसने कई समीकरण बिगाड़ दिए हैं। देर रात तक सड़कों पर उतरना, अस्पतालों का औचक निरीक्षण करना और अतिक्रमण पर बिना किसी दबाव के कार्रवाई करना उनकी पहचान बन चुका है। उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी है उनकी ‘जनसुनवाई’, जहाँ फरियादी को यह भरोसा मिलता है कि उसकी समस्या का समाधान रसूख देखकर नहीं, बल्कि नियम देखकर होगा।
क्या एक ‘धड़ा’ नहीं कर पा रहा बर्दाश्त?
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि डीएम बंसल की ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली छवि सिस्टम के कुछ पुराने खिलाड़ियों को रास नहीं आ रही है। जब भी कोई अधिकारी सिस्टम की सफाई करने की कोशिश करता है, तो वह ‘धड़ा’ सक्रिय हो जाता है जो यथास्थिति बनाए रखने में अपना हित देखता है।
सख्त फैसले: भू-माफियाओं और अवैध कब्जों पर कड़ा प्रहार।
प्रशासनिक कसावट: दफ्तरों में लेटलतीफी और भ्रष्टाचार पर लगाम।
दबाव की राजनीति: रसूखदारों की सिफारिशों को दरकिनार कर जनहित को प्राथमिकता देना।
इन्हीं कारणों से अब दबी जुबान में उनके तबादले की अटकलें तेज होने लगी हैं। क्या यह ईमानदारी की वह कीमत है जिसे हर उस अधिकारी को चुकाना पड़ता है जो झुकने को तैयार नहीं?
ईमानदारी बनाम तबादले: एक पुरानी जंग
हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का नाम आज देश में ‘ईमानदारी और तबादलों’ का पर्याय बन चुका है। 50 से अधिक तबादले झेलने वाले खेमका ने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। देहरादून के वर्तमान हालातों को देखते हुए लोग सविन बंसल की तुलना उनसे करने लगे हैं।
जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है: “क्या एक ईमानदार अधिकारी को अपना कार्यकाल पूरा करने का मौका मिलेगा???
