March 25, 2026

कोलकाता स्थित I-पीएसी आफिस पर ईडी का छापा मारने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी चेतावनी दी:कपिल सिब्बल को मूल मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने को कहा

Delhi 24 March 2026,

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय ईडी की कोलकाता स्थित I-पीएसी आफिस पर ईडी का छापा मारने के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कप‍िल स‍िब्‍बल और न्यायाधीश के बीच कानूनी बिंदुओं पर जोरदार बहस हुई। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने सिब्बल को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए उन्हें मामले के मूल मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है लंकि कोलकाता स्थित I-पीएसी दफ्तर में की जा रही जांच और छापेमारी के दौरान राज्य सरकार ने और बनर्जी ने दखल दिया. इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.के मिश्रा और जस्टिस एन.वी.jझंझंजारिया की बेंच कर रही है। पिछली सुनवाई में कोर्ट पहले ही टिप्पणी कर चुका है कि किसी भी जांच एजेंसी के काम में इस तरह का हस्तक्षेप ‘अच्छी स्थिति’ नहीं माना जा सकता। कप‍िल सिब्बल ने दलील दी क‍ि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की शुरुआत में कपिल सिब्बल ने ईडी की याचिका की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिएहैं. उन्होंने कहा क‍ि यह याचिका एक डिप्टी डायरेक्टर के जरिए दायर की गई है जो घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे. ऐसे में यह याचिका सुनवाई योग्य कैसे हो सकती है? सिब्बल ने तर्क दिया कि यह मामला मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा बताया जा रहा है, लेकिन याचिकाकर्ता खुद पीड़ित नहीं है. उन्‍होंने आगे दलील दी क‍ि जो व्यक्ति मौके पर था ही नहीं, वह दूसरों के मौलिक अधिकारों का मुद्दा कैसे उठा सकता है? इस पर कोर्ट ने कहा क‍ि अमौलिकधिकार सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इस पर बेंच ने सख्त रुख अपनाया और कहा कि मौलिक अधिकार हमेशा किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होते।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा क‍ि क्या ‘रूल ऑफ लॉ’ आप में एक मौलिक अधिकार नहीं है? कप‍िल सिब्बल ने जवाब में कहा कि अगर ‘रूल ऑफ लॉ’ का उल्लंघन बताया जा रहा है, तो यह स्पष्ट करना होगा कि उल्लंघन किस तरह हुआ। बहस के दौरान कोर्ट ने केशवानंद भारती केस का भी हवाला दिया और कहा कि संविधान की मूल संरचना भी मौलिक अधिकारों से जुड़ी है। कपिल स्सिब्बल ने दलील दी कि ईडी एक डायरेक्टरेट’ है और न कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था या विभाग। कोई विवाद है, तो केंद्र सरकार को अनुच्छेद 131 के तहत आना चाहिए न कि अनुच्छेद 32 के तहत। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सीधे सुप्रीम कोर्ट में मौलिक अधिकार के आधार पर याचिका नहीं ला सकती है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त सवाल दागा और न्यायाधीश ने कहा क‍ि अगर मुख्यमंत्री खुद जांच में दखल देते हैं, तो ईडी किसे शिकायत करेगी? उसी राज्य सरकार को जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री कर रहे हैं? इस सवाल ने सिब्बल की दलील को चुनौती दी। सिब्बल ने जवाब दिया कि कोर्ट यह मानकर चल रहा है कि मुख्यमंत्री ने अपराध किया है, जबकि यह केवल आरोप है। कोर्ट ने स्पष्ट किया क‍ि यह एक आरोप है, लेकिन यह तथ्यों पर आधारित आरोप है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सिब्बल को सीधे चेतावनी दी क‍ि ईडी, ईडी, ईडी की रट मत लगाइए। मुद्दे पर आइए… अन्यथा आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि सिब्बल को उन ईडी अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर ध्यान देना चाहिए, जिन्होंने अलग से याचिका दायर की है।

कपिल सिब्बल ने जवाब में कहा कि अगर कोई अपराध हुआ है, तो उसके लिए कानून में पहले से उपाय मौजूद हैं।उन्होंने कहा क‍ि लोक सेवक के काम में बाधा डालना एक आपराधिक अपराध है और इसके लिए बीएनएस के तहत कार्रवाई हो सकती है। उनका तर्क था कि हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में मौलिक अधिकार के आधार पर नहीं लाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग पहलू हैं। पीएमएलए के तहत चल रही जांच का अलग आरोप लगा है। कोर्ट के मुताबिक, यह दूसरा आततरोप एक स्वतंत्र मामला है और इसे अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।

 

 

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