गांधी दर्शन – बीएचयू में 4 फरवरी 1916 का महात्मा गांधीजी का भाषण,
Uttrakhand 14 January 2026,
गांधी दर्शन:4 फरवरी 1916; महामना मदन मोहन मालवीय के अथक प्रयासों से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बीएचयू का शिलान्यास हो रहा था। मंच पर एनी बेसेंट और भारत के दिग्गज राजे-रजवाड़े हीरे-जवाहरातों से लदे बैठे थे। दक्षिण अफ्रीका से 21 वर्षों बाद सत्याग्रह की सफलता के बाद हाल ही में भारत लौटे थे मोहनदास करमचंद गांधी। बीएचयू के इस दीक्षांत समारोह में गांधीजी को सुनने के लिए लोग उत्सुक थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि शांत दिखने वाला यह व्यक्ति शब्दों के ऐसे बाण चलाएगा जो सत्ता के गलियारों में हलचल मचा देंगे।
गांधीजी ने जब बोलना शुरू किया, तो पहला प्रहार उन्होंने भाषा पर किया। उन्होंने अंग्रेजी में बोलते हुए अत्यंत खेद के साथ कहा, “यह मेरे लिए गहरी लज्जा और अपमान का विषय है कि मुझे अपने ही देशवासियों को एक विदेशी भाषा में संबोधित करना पड़ रहा है। उनका तर्क था—यदि शिक्षा और संवाद की भाषा अपनी नहीं होगी, तो जनमानस कभी अपनी आत्मा से नहीं जुड़ पाएगा। हॉल में सन्नाटा पसर गया, क्योंकि वहां उपस्थित संभ्रांत वर्ग के लिए अंग्रेजी ही उनकी श्रेष्ठता का प्रतीक थी। गांधीजी ने मंच पर बैठे उन महाराजाओं की ओर देखा जो अपनी धन-संपदा का प्रदर्शन कर रहे थे। मालवीय जी ने इन्हीं राजाओं के दान से विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, लेकिन गांधीजी ने सत्य बोलने में संकोच नहीं किया। उन्होंने कहा: “मैं जब इन राजकुमारों को देखता हूँ, तो मुझे ईर्ष्या नहीं बल्कि दुख होता है। जो हीरे-जवाहरात आपने पहन रखे हैं, वे इस देश के उन गरीबों के खून-पसीने की कमाई हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत की है। भारत तब तक आजाद नहीं होगा, जब तक आप इनको भारत वासियों के हित में न लगा दें। गांधीजी के इन शब्दों से समारोह में उपस्थित राजे-रजवाड़े अपमानित महसूस कर उठकर जाने लगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही एनी बेसेंट ने गांधीजी को बीच में टोकते हुए रुकने को कहा। लेकिन वहां मौजूद छात्रों और आम जनता ने शोर मचाया—”गांधी को बोलने दिया जाए! उस दिन काशी की धरती पर लोगों ने गांधीजी के भीतर उस नेतृत्व को पहचान पहचाना, जो आगे चलकर ‘महात्मा’ बनने वाला था। वहां मौजूद लोगों को समझ आ गया था कि यह शख्स न तो पद से डरता है, न प्रतिष्ठा से।इस घटनाक्रम से जो सबसे बड़ी सीख मिलती है, वह है निर्भयता। इन दिनों गांधीजी कोई बड़ी राजनीतिक हैसियत नहीं थीं, फिर भी उन्होंने उस समय की सबसे शक्तिशाली हस्तियों को आईना दिखाया। उन्होंने सिखाया कि सत्य कहने के लिए किसी ‘सही समय’ का इंतजार नहीं करना पड़ता। मदन मोहन मालवीय और गांधीजी के बीच में वैचारिक मतभेद होने के बावजूद दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति अगाध सम्मान था। मालवीय जी ने शिक्षा की नींव रखी थी, तो गांधी ने उस शिक्षा को ‘आत्मसम्मान’ और ‘निर्भयता’ का मंत्र दिया। 1916 का वह भाषण केवल एक वक्तव्य नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंत की घोषणा थी।
