February 12, 2026

जोशीमठ ओबीसी जातियों को केंद्रीय सूची में शामिल करने का मुद्दा संसद में

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद श्री महेंद्र भट्ट ने जोशीमठ की ओबीसी जातियों को केंद्रीय सूची में शामिल करने का विषय केंद्र के समक्ष उठाया हैं। संसद के पटल पर छावनी बोर्ड को लेकर पूछे सवाल के ज़बाब में केंद्र ने सिविल क्षेत्रों को नगरपालिका में शामिल करने की प्रक्रिया को चुनाव और निधि आवंटन में देरी का कारण बताया है।

उन्होंने इस विषय से प्रभावित लोगों की समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्रीय सूची में सम्मिलित न होने के कारण संबंधित समुदायों को केंद्र सरकार द्वारा संचालित विभिन्न शैक्षणिक छात्रवृत्ति, योजनाओं रोजगार के अवसरों तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है। जबकि राज्य में पहले से ही कई समुदाय ओबीसी श्रेणी में शामिल हैं और पैनखण्डा समुदाय भी उसी समानता की उम्मीद करता है। यह विषय सामाजिक न्याय के सिद्धांतों तथा संविधान के अनुच्छेद 15 (4) एवं 16 (4) की भावना से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार द्वारा की गई अनुशंसाओं के बावजूद इस संबंध में अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

वहीं विश्वास जताते हुए कहा कि जोशीमठ के पैनखण्डा समुदाय को ओबीसी की केन्द्रीय सूची में शामिल करने से न केवल इस समुदाय को लाभ मिलगा बल्कि यह समाज के समग्र विकास की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम होगा। जिसके लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री से अनुरोध करते हुए कहा कि जोशीमठ क्षेत्र की संबंधित अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को केंद्रीय ओबीसी सूची में सम्मिलित करने हेतु शीघ्र आवश्यक कार्यवाही की जाए।

इसी तरह एक अन्य महत्वपूर्ण विषय को उठाते हुए उनके द्वारा छावनी बोर्डों के लंबित चुनाव और वित्त आयोग द्वारा इन बोर्डों को दिए जाने वाले अनुदान को लेकर सवाल पूछा गया। जिसपर ज़बाब देते हुए रक्षा राज्य मंत्री श्री संजय सेठ ने बताया कि वर्तमान वर्ष में, 29 छावनी बोर्ड केन्द्रीय वित्त आयोग अनुदानों के अंतर्गत पहले ही निधियां प्राप्त कर चुके हैं। उत्तराखण्ड राज्य में स्थित छावनी बोर्डों के मामले में वहां चुनाव न होने को सीएफसी अनुदानों की गैर-प्राप्ति के लिए एक कारण है। इस मसले पर सिद्धान्ततः यह निर्णय लिया गया है कि चयनित छावनियों को सिविल क्षेत्रों से अलग करें और उन्हें संबंधित राज्य की नगरपालिकाओं में शामिल किया जाए। चूंकि अलग करने की प्रक्रिया का परिणाम छावनी बोर्डों की शासन संरचना प्रभावित करती है, इसलिए बोर्डों के चुनाव अभी तक नहीं कराए गए हैं। यह मामला वर्तमान में दिल्ली, तेलंगाना और मध्य प्रदेश की माननीय उच्च न्यायालयों में भी लंबित है।

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