सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक अल्कोहल’ को नशीली शराब की श्रेणी में रखा
दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने 8:1 बहुमत से कहा कि राज्यों के पास ‘विकृत स्प्रिट या औद्योगिक अल्कोहल’ को विनियमित करने का अधिकार है। राज्य सरकारें इसको टैक्स के दायरे में ला सकती हैं।
जजों की संविधान पीठ में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस हृषिकेश रॉय, जस्टिस अभय एस ओक, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस उज्जल भुयान, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। न्यायालय को अनिवार्य रूप से यह जांचने का काम सौंपा गया कि क्या उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 ने औद्योगिक शराब के विषय पर संघ को पूर्ण विनियामक शक्ति दी है।
क्या है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नशीली शराब का मतलब केवल वो शराब नहीं है जिसे पीने के लिए बनाया गया है। इसका मतलब है वो सभी शराबें जो किसी भी तरह से लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इस फैसले से यह साफ हुआ है कि औद्योगिक शराब, जो कि आमतौर पर उद्योगों में इस्तेमाल होती है, उसे भी नशीली शराब के श्रेणी में रखा जाएगा।
बता दें कि 1990 सिंथेटिक्स एंड केमिकल्स बनाम राज्य उत्तर प्रदेश मुकदमे में कोर्ट ने कहा था कि “नशीली शराब” सिर्फ पीने लायक शराब को ही कहा जा सकता है। और राज्य औद्योगिक शराब पर टैक्स नहीं लगा सकते। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए औद्योगिक अल्कोहल’ को नशीली शराब की श्रेणी में जोड़ दिया है। राज्य सरकारें इसको टैक्स के दायरे में ला सकती हैं।
Supreme Court classifies ‘industrial alcohol’ as intoxicating liquor: States given power to regulate industrial alcohol.
