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August 16, 2026

राज्य के गांव प्यासे, स्कूल जर्जर, स्वास्थ्य व्यवस्था लचर, सांसद दूसरे राज्यों पर मेहरबान

उत्तराखंड के सुदूर गांव आज भी पानी, सड़क और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं, लेकिन राज्य के सांसद अपनी सांसद निधि का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों में खर्च करने में जुटे हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आया है।

1.28 करोड़ की दरियादिली

RTI से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड के सांसदों ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में ट्यूबवेल, स्कूल, सामुदायिक भवन और जल निकासी जैसे कार्यों के लिए कुल 1.28 करोड़ रुपये आवंटित किए। सवाल यह है कि जब अपने राज्य के गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, तो यह धनराशि बाहर क्यों लुटाई गई?

आगरा पर सबसे ज्यादा मेहरबानी

दूसरे राज्यों पर सबसे ज्यादा दरियादिली दिखाने में टिहरी गढ़वाल की सांसद माला राजलक्ष्मी शाह सबसे आगे हैं। उन्होंने वित्तीय वर्ष 2024-25 में अकेले उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के लिए एक करोड़ रुपये आवंटित किए। इसमें फुटपाथ, पैदल मार्ग और पेयजल से जुड़े कार्य शामिल हैं। अपने संसदीय क्षेत्र की अनदेखी और आगरा पर विशेष ध्यान अब कई सवाल खड़े कर रहा है।

हरियाणा तक पहुंची सांसद निधि

राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने भी उत्तराखंड से बाहर कदम बढ़ाते हुए हरियाणा में स्कूल, कॉलेज और सामुदायिक भवनों के लिए 25 लाख रुपये स्वीकृत किए। यह तब है जब उत्तराखंड के कई स्कूल खुद जर्जर हालत में हैं

पुराने कार्यकाल की नई सांसद निधि

पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय के कार्यकाल (2010-16) के दौरान स्वीकृत धनराशि को भी वर्षों बाद 10 दिसंबर 2025 को आवंटित दिखाया गया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जल निकासी और सड़कों के लिए 3 लाख रुपये स्वीकृत किए थे। सवाल यह है कि पुराने कार्यकाल की राशि अब किस प्रक्रिया के तहत जारी की गई?

नैनीताल पर अजय की कृपा

अल्मोड़ा से लोकसभा सांसद अजय टम्टा ने अपने संसदीय क्षेत्र से इतर नैनीताल जिले में स्कूल और कॉलेजों में कमरे व हॉल निर्माण के लिए 27 जून 2025 को 5 लाख रुपये स्वीकृत किए। अपने क्षेत्र की जरूरतों की तुलना में यह फैसला भी सवालों के घेरे में है।

RTI से सामने आए ये तथ्य साफ संकेत देते हैं कि सांसद निधि के इस्तेमाल पर न तो ठोस निगरानी है और न ही जवाबदेही। सवाल ये है कि जब उत्तराखंड के गांव आज भी प्यासे और बेहाल हैं, तो सांसदों की प्राथमिकता दूसरे राज्य क्यों बन रहे हैं?

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