कालबेलिया की धूम, वीणा की झंकार और राहुल देशपांडे के सुरों से सजी विरासत की शाम
विरासत महोत्सव-2026 के 13वें दिन की सांस्कृतिक संध्या राजस्थान की लोक संस्कृति, कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और भारतीय शास्त्रीय गायन के नाम रही। महोत्सव के भव्य मंच पर एक ओर राजस्थानी लोक नृत्य कालबेलिया की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर किया, वहीं दूसरी ओर प्रसिद्ध वीणा वादक रामन्ना बालाचंद्रन और प्रख्यात शास्त्रीय गायक राहुल देशपांडे ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। दून इंटरनेशनल स्कूल के युवा फ्यूजन बैंड ने भी अपनी संगीतमय प्रस्तुति से शाम को खास बना दिया।
सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत राजस्थानी लोक नृत्य कालबेलिया की शानदार प्रस्तुति से हुई। कलाकार गीता, मनीषा और निशा ने पारंपरिक वेशभूषा और आकर्षक नृत्य के माध्यम से राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति और कलात्मक परंपरा को खूबसूरती से मंच पर उतारा। जोशीले लोकगीतों और नृत्य की लय ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। प्रस्तुति में जाकिर खान ने हारमोनियम, दूड़े खान ने सारंगी, शौकत खान ने ढोलक, इरफान हुसैन ने खड़ताल, रामनाथ ने डफली और सागर ने मंजीरा पर संगत की। वहीं गायन में सलीम खान, फारूक, सोनू खान और जाकिर ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा।
इसके बाद दून इंटरनेशनल स्कूल के फ्यूजन बैंड ने मंच संभाला। स्कूली विद्यार्थियों ने शास्त्रीय और अर्धशास्त्रीय संगीत का सुंदर संगम प्रस्तुत कर दर्शकों को प्रभावित किया। बैंड में प्रणव मंझखोला ने कीबोर्ड और कीज, श्लोक रौथान और ओजस्वी पैन्यूली ने गायन, कार्तिकेय ने ड्रम्स, पनव जौहरी ने इलेक्ट्रिक गिटार, नंदिनी ने बास गिटार और मनवीर सिंह ने तबले पर संगत की। युवा कलाकारों की ऊर्जा और संगीत के प्रति उनकी प्रतिभा ने विरासत के मंच पर नई पीढ़ी की सांस्कृतिक अभिरुचि को भी प्रदर्शित किया।
सांस्कृतिक संध्या का एक प्रमुख आकर्षण प्रसिद्ध वीणा वादक रामन्ना बालाचंद्रन की प्रस्तुति रही। उन्होंने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वीणा वादन से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत राग वागधीश्वरी से की। उनके सुरों की मधुरता और वादन की बारीकियों ने पूरे वातावरण को संगीतमय बना दिया। इस दौरान पटरी सतीश कुमार ने मृदंगम पर संगत की। दोनों कलाकारों के बीच सुर और ताल का शानदार सामंजस्य देखने को मिला।
रामन्ना बालाचंद्रन कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के प्रतिभाशाली वीणा वादकों में शुमार हैं। उन्हें बचपन से ही संगीत की शिक्षा मिली। उनकी मां शरण्या ने उन्हें प्रारंभिक संगीत प्रशिक्षण दिया, जबकि बाद में उन्होंने वीणा वादन की बारीकियां अन्य गुरुजनों से सीखीं। महज 16 वर्ष की आयु में उन्हें ऑल इंडिया रेडियो की ओर से ए ग्रेड से सम्मानित किया गया। मद्रास संगीत अकादमी ने भी उनकी प्रतिभा को देखते हुए कम उम्र में ही अपने प्रतिष्ठित वार्षिक संगीत कार्यक्रम में प्रस्तुति देने का अवसर प्रदान किया। भारत और विदेशों के प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दे चुके रामन्ना अपनी विशिष्ट शैली और वीणा वादन की असाधारण क्षमता के लिए पहचाने जाते हैं।
वहीं, शाम का एक और बड़ा आकर्षण प्रख्यात शास्त्रीय गायक राहुल देशपांडे की प्रस्तुति रही। उन्होंने अपनी सुरीली आवाज, प्रभावशाली गायकी और शास्त्रीय संगीत की गहराई से विरासत की महफिल में समां बांध दिया। उनकी प्रस्तुति के दौरान श्रोता संगीत के सुरों में डूबे नजर आए। उनके साथ तबले पर शुभ महाराज, हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा तथा तानपुरे पर परीक्षित सिंह राठौड़ और सृष्टि कला ने संगत की।
राहुल देशपांडे भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित कलाकारों में शामिल हैं। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक स्वर्गीय पंडित वसंतराव देशपांडे के पौत्र हैं। उन्होंने अपनी गायकी को विभिन्न संगीत परंपराओं और घरानों की विशेषताओं से समृद्ध किया है। उनके गायन में ख्याल, ठुमरी, दादरा, नाट्यगीत, भजन, गजल और भावगीत जैसी विविध विधाओं का समावेश देखने को मिलता है। उन्हें उषाताई चिपलकट्टी और मुकुल शिवपुत्र सहित कई प्रतिष्ठित संगीत गुरुओं का मार्गदर्शन मिला है।
राहुल देशपांडे ने शास्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। मराठी संगीत नाटकों की समृद्ध परंपरा को पुनर्जीवित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके चर्चित नाटक ‘कट्यार कलजात घुसली’ को काफी लोकप्रियता मिली, जिस पर बाद में फिल्म भी बनी। इसके अलावा उन्होंने ‘संगीत मान अपमान’ और ‘संशय कल्लोल’ जैसे प्रतिष्ठित मराठी नाटकों के माध्यम से भी संगीत प्रेमियों तक पारंपरिक संगीत की विरासत पहुंचाई है। फिल्म ‘मी वसंतराव’ में उन्होंने अपने दादा पंडित वसंतराव देशपांडे की भूमिका निभाने के साथ फिल्म का संगीत भी तैयार किया।
विरासत महोत्सव की इस सांस्कृतिक संध्या ने लोक संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत तक भारतीय कला और संस्कृति की विविधता को एक ही मंच पर प्रस्तुत किया। राजस्थानी कालबेलिया की जीवंतता, युवा विद्यार्थियों के फ्यूजन संगीत, रामन्ना बालाचंद्रन की वीणा के मधुर सुर और राहुल देशपांडे की प्रभावशाली गायकी ने 13वें दिन की शाम को यादगार बना दिया।
