April 14, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने मताधिकार से वंचित लाखों लोगों को अंतरिम राहत देने से किया इंकार: कहा अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने अपनी अपील दायर करें।

West Bengal,13 April 2026,

पश्चिम बंगाल में विशेष गणना (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची से लाखों मतदाताओं का नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने नियमों का हवाला देते हुए कहा, चुनाव से ठीक पहले किसी भी जल्दबाजी में लिया गया फैसला पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। और पश्चिम बंगाल के मताधिकार से वंचित लाखों लोगों को अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया। साथ ही अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने अपनी अपील दायर करने के लिए कहा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ तौर पर कहा कि वह ऐसा कोई आदेश नहीं देना चाहती जिससे अपीलीय ट्रिब्यूनल पर अत्यधिक दबाव पड़े। कोर्ट की जानकारी में लाया गया कि, 11 अप्रैल 2026 तक पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 34 लाख से अधिक अपीलें दायर हो चुकी हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चिंता जताई कि अगर जल्दबाजी में फैसले लिए गए, तो त्रुटियां होने की संभावना बढ़ सकती है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को संतुलित रखना जरूरी है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने कोर्ट में कहा कि, लाखों लोग खुद को वैध मतदाता मानते हैं और वे अपने मतदानं का इस्तेमाल करना चाहते हैं।बनर्जी ने कोर्ट कि जितनी संभव हो सके उतनी अपीलों का निपटारा मतदान से पहले किया जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि प्रभावित मतदाताओं के लिए एक पूरक मतदाता सूची जारी की जा सकती है, जिससे वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले सकें। पीठ ने इस मुद्दे पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही। बी. पारदीवाला ने कहा कि मतदाताओं के अधिकार और सत्यापन की जरूरत के बीच एक ‘मध्य मार्ग’ निकालने की कोशिश करेगी। वहीं, न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि नियमों में पहले से ही अपील का प्रावधान मौजूद है और यदि कोई अपील स्वीकार होती है, तो संबंधित अधिकारी तुरंत मतदाता सूची में संशोधन कर सकते हैं। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कर सकती है।

चुनाव आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि, ‌चुनाव के लिए मतदाता सूची को अंतिम रूप देने और संशोधन की प्रक्रिया अलग-अलग ढांचे के तहत होती है, जिससे अंतिम समय में बदलाव करना मुश्किल हो जाता है। वहीं, वरिष्ठ वकील वी. गिरी ने कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई और संवेदनशील इलाकों पर नजर रखने की मांग की।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जिस देश में कोई पैदा हुआ है, वहां वोट देना केवल एक कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक मुद्दा भी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कुरैशी यास्मिन नाम की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिनका नाम एसआईआर प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि वोटिंग का अधिकार भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए अपीलों को गंभीरता से सुनना जरूरी है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2002 के रोल में शामिल लोगों को कोई दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं थी, लेकिन ईसीआई बिहार में अपने पुराने स्टैंड से अलग हो गया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की मदद ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता कुरैशी यास्मिन को निर्देश दिया कि वे इस मकसद के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने अपनी अपील दायर करें।

 

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