उत्तराखंड में रोजाना 1930 मीट्रिक टन कचरा पैदा, 93.46 प्रतिशत का हो रहा प्रसंस्करण
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), देहरादून की ओर से सचिवालय मीडिया सेंटर में ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन’ विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इसमें ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026, लीगेसी वेस्ट और डंपसाइट रेमेडिएशन, कचरा पृथक्करण, वायु प्रदूषण नियंत्रण और स्थानीय निकायों की भूमिका को लेकर विस्तार से जानकारी दी गई।
पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में वैज्ञानिक और डेटा आधारित व्यवस्था को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के साथ जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छ वायु का लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता से हासिल किया जा सकता है।
चार श्रेणियों में कचरा अलग करना अनिवार्य
डॉ. धकाते ने बताया कि 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 में कचरे को चार धाराओं—गीला, सूखा, सैनिटरी और विशेष देखभाल वाला कचरा—में अलग करने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही बल्क वेस्ट जनरेटर्स की जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं और एक्सटेंडेड बल्क वेस्ट जनरेटर्स रिस्पांसिबिलिटी (EBWGR) की व्यवस्था की गई है।
नए नियमों के तहत कचरे के संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और निपटान की ऑनलाइन निगरानी के साथ डिजिटल पंजीकरण और रिपोर्टिंग का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के साथ कचरे को संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना है। लैंडफिल को अंतिम विकल्प रखते हुए पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग को प्राथमिकता दी गई है।
108 निकायों के 1314 वार्डों में डोर-टू-डोर कलेक्शन
डॉ. धकाते के अनुसार उत्तराखंड के 108 शहरी स्थानीय निकायों के 1,314 वार्डों में 100 प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की व्यवस्था है। राज्य में करीब 1,515 वाहन उपलब्ध हैं और अतिरिक्त वाहनों की खरीद प्रक्रिया चल रही है। चार-धारा कचरा पृथक्करण के लिए नए वाहनों में चार अलग-अलग कंपार्टमेंट की व्यवस्था की जा रही है।
राज्य के 1,225 वार्डों में स्रोत पर कचरा पृथक्करण शुरू किया जा चुका है। प्रदेश में प्रतिदिन करीब 1,930.85 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से 1,804.59 मीट्रिक टन यानी 93.46 प्रतिशत कचरे का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जा रहा है।
61 डंपसाइट चिन्हित, 54.41 प्रतिशत पुराने कचरे का उपचार
राज्य में 61 लीगेसी वेस्ट/डंपसाइट चिन्हित की गई हैं। इनमें मौजूद करीब 23.34 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे में से 12.70 लाख मीट्रिक टन यानी 54.41 प्रतिशत कचरे का उपचार किया जा चुका है। दिसंबर 2026 तक पुराने कचरे के उपचार और डंपसाइट रेमेडिएशन में तेजी लाने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तराखंड में फिलहाल 85 एमआरएफ, 663 NADEP/कम्पोस्ट पिट और 87 प्लास्टिक कॉम्पैक्टर संचालित हैं। वहीं 1,058 बल्क वेस्ट जनरेटर्स की पहचान की गई है। कचरा संग्रहण और परिवहन की निगरानी के लिए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम (VLTS) लागू किया जा रहा है। प्रथम चरण में सभी नगर निगमों को इसके दायरे में लाया जा रहा है।
‘जीरो डंपसाइट’ की दिशा में आगे बढ़ रहा देश
अपर निदेशक, शहरी विकास प्रवीण कुमार ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन, BWGs की जवाबदेही, डिजिटल पंजीकरण, निगरानी और अनधिकृत डंपिंग पर कार्रवाई को लेकर स्पष्ट जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत ‘जीरो डंपसाइट’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
डंपसाइट रेमेडिएशन के माध्यम से पुराने कचरे का वैज्ञानिक उपचार कर उसे सड़क निर्माण सामग्री, भरान सामग्री, रिसाइकल योग्य वस्तुओं और RDF जैसे उपयोगी संसाधनों में बदला जा रहा है। इससे वायु एवं भूजल प्रदूषण के साथ डंपसाइट में आग लगने की घटनाओं को कम करने में मदद मिलती है।
चारधाम और पर्यटन क्षेत्रों के लिए विशेष योजना पर जोर
प्रवीण कुमार ने मेयर, पार्षदों और अन्य जनप्रतिनिधियों से नागरिकों को चार स्तरीय कचरा पृथक्करण, प्लास्टिक के जिम्मेदार उपयोग और स्वच्छता नियमों के पालन के लिए प्रेरित करने का आग्रह किया। RWA, होटल, रेस्तरां और अन्य बल्क वेस्ट जनरेटर्स के कचरे के उचित प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।
चारधाम और अन्य पर्यटन क्षेत्रों में बढ़ती तीर्थयात्रा एवं पर्यटन गतिविधियों को देखते हुए कचरा संग्रहण, पृथक्करण, परिवहन और वैज्ञानिक प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था के लिए विशेष योजना तैयार करने पर जोर दिया गया।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान
उन्होंने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों और द्वीपों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इनमें पर्यटकों से यूजर चार्ज लेना और उपलब्ध अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं के आधार पर स्थानीय निकायों द्वारा पर्यटकों के आगमन को नियंत्रित करना शामिल है।
इन क्षेत्रों में गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए विशेष संग्रहण केंद्र स्थापित किए जाएंगे। होटल और रेस्तरां को निर्धारित मानकों के अनुसार गीले कचरे का विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण करना होगा।
उन्होंने कहा कि स्वच्छ वायु और प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए सरकार, स्थानीय निकायों, जनप्रतिनिधियों, संस्थानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और नागरिकों की सामूहिक भागीदारी जरूरी है।
