SIR पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, चुनाव आयोग को बड़ी राहत
Supreme Court of India ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए Election Commission of India को बड़ी राहत दी है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा कि SIR प्रक्रिया कानूनी और संवैधानिक रूप से वैध है तथा इसमें किसी प्रकार की खामी नहीं पाई गई। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि यह प्रक्रिया देशभर में पहले की तरह जारी रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर अपनाई है। अदालत ने माना कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है और मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जांच के बाद किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने से इनकार कर सकता है। अदालत ने कहा कि SIR प्रक्रिया संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुरूप है तथा इसे केवल प्रशासनिक सुविधा का कदम नहीं माना जा सकता।
दरअसल, कई याचिकाओं में चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि SIR प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के तहत मिली शक्तियों से आगे जाती है। विवाद उस नियम को लेकर ज्यादा बढ़ा, जिसमें 2002 या कुछ राज्यों में 2003 की मतदाता सूची में नाम नहीं होने पर लोगों से अपने पूर्वजों का लिंक साबित करने को कहा गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे गरीब, प्रवासी और पिछड़े वर्ग के वास्तविक मतदाताओं को परेशानी हो सकती है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और मतदाताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कुछ अंतरिम निर्देश भी दिए थे। पहले आयोग ने सत्यापन के लिए 11 दस्तावेज निर्धारित किए थे, लेकिन बाद में अदालत के निर्देश पर आधार कार्ड को भी अतिरिक्त दस्तावेज के रूप में शामिल किया गया।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने पिछले वर्ष जून में बिहार में SIR प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे बाद में पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। आयोग का कहना था कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाना तथा डुप्लीकेट एवं अयोग्य मतदाताओं को हटाना है।
करीब लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिस पर बुधवार को अंतिम फैसला सुनाया गया।
