रेलवे के किसी भी सरकारी दस्तावेज या बोलचाल में ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’, शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा: सुप्रीम कोर्ट ने,
Delhi 17 July 2026,
रेलवे में द्वितीय श्रेणी यात्रियों की सुरक्षा उनके मान-सम्मान को लेकर एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे के पुराने तौर-तरीकों शब्दावली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, अब रेलवे के किसी भी सरकारी दस्तावेज या बोलचाल में ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’, द्वितीय श्रेणी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा? कोर्ट का मानना है कि भारत के सामाजिक इतिहास को देखते हुए किसी भी नागरिक को इस तरह से संबोधित करना देश के संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। ओए लकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी मुसाफिर की श्रेणी इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसने सफर के लिए कितने पैसे खर्च किए हैं। इंसान की गरिमा सबसे ऊपर है। रेलवे अब ‘सेकंड क्लास कोच’ या ‘द्वितीय श्रेणी डिब्बा’ शब्द का उपयोग करेगा, न कि उस डिब्बे में यात्रा करने वाले नागरिकों को द्वितीय श्रेणी का इंसान या यात्री कहेगा।
कोर्ट ने राज्य हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृतक यात्री की पत्नी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने इस मामले में रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पुराने निर्णय को पूरी तरह से पलट दिया है। मामला यह था कि एक हादसे में ट्रेन से गिरने के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, लेकिन दुर्घटना के समय उसका टिकट नहीं मिल पाया था। इस आधार पर निचली अदालतों ने मुआवजा देने से मना कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि केवल जेब या सामान से टिकट न मिलने के आधार पर किसी भी व्यक्ति को बिना टिकट यात्रा करने वाला दोषी नहीं मान लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब हादसे में इंसान की जान चली जाती है, तो कई बार उसका कीमती सामान बैग भी गायब हो जाते हैं. इस मामले में भी मृतक का बैग गुम हो गया था, जिसमें असली टिकट रखा हुआ था. मृतक की पत्नी ने कोर्ट में हलफनामा देकर साफ कहा था कि उनके पति टिकट खरीदकर ही ट्रेन में सवार हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले के कानूनी फैसलों को देखा जाए तो ऐसे मामलों में दावे की शुरुआती पुष्टि के लिए पत्नी का यह हलफनामा पूरी तरह से काफी है। सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को आदेश दिया है कि वह पीड़ित महिला को 8 लाख रुपये का मुआवजा पूरी ब्याज दर के साथ अदा करे।
गौरतलब है कि,करीब ग्यारह साल पहले यानी 28 नवंबर 2015 को रायपुर से अहमदाबाद जाने के लिए चंद्रकांत ठक्कर नाम के व्यक्ति ने अहमदाबाद-हावड़ा मेल में सफर शुरू किया था। सफर के दौरान तेगांव सेक्शन के पास चलती ट्रेन से अचानक नीचे गिर जाने के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। उनकी पत्नी ने ट्रिब्यूनल में चार लाख रुपये के मुआवजे की गुहार लगाई थी, जिसे यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि यात्रा का कोई पक्का सबूत नहीं है। इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी जनवरी 2024 में इसी तकनीकी खराबी को आधार बनाकर अर्जी खारिज कर दी थी, जिसे अब देश की सुप्रीम कोर्ट ने न्याय देते हुए बदल दिया है।
