आईआईटी रुड़की के अध्ययन में चेतावनी, जलवायु परिवर्तन से उत्तराखंड की जल सुरक्षा पर गहरा संकट
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की और जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र स्थित कोसी नदी बेसिन की दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। अध्ययन के अनुसार बढ़ता तापमान, भूजल पुनर्भरण में गिरावट और सूखे की बढ़ती घटनाएं कृषि, पेयजल आपूर्ति तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक प्रभाव डाल सकती हैं।
यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका थियोरेटिकल एंड अप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन आईआईटी रुड़की के डॉ. बी. दास, डॉ. एस. सेन तथा जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने संयुक्त रूप से किया। शोधकर्ताओं ने पाँच वैश्विक जलवायु मॉडलों के पूर्वानुमानों को सोइल एंड वाटर असेसमेंट टूल (SWAT) मॉडल के साथ जोड़कर भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का कोसी नदी बेसिन की जल प्रणाली पर संभावित प्रभावों का आकलन किया।
अध्ययन के अनुसार 21वीं शताब्दी के दौरान बेसिन के जलवैज्ञानिक चक्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अनुमान है कि वर्तमान में लगभग 38.4 डिग्री सेल्सियस रहने वाला अधिकतम तापमान शताब्दी के अंत तक मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में 41.6 डिग्री सेल्सियस और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। तापमान में इस वृद्धि से वाष्पीकरण बढ़ेगा और जल उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आई. डी. भट्ट ने कहा कि अध्ययन हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों की जलवैज्ञानिक प्रणाली में संभावित बड़े बदलावों की ओर संकेत करता है। उनके अनुसार बढ़ते तापमान के कारण वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा और भूजल पुनर्भरण घटेगा। उन्होंने कहा कि पर्वतीय समुदाय प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं, इसलिए जलवायु परिवर्तन और सूखे के बढ़ते जोखिमों से निपटने के लिए विज्ञान आधारित जल प्रबंधन और अनुकूलन रणनीतियां अपनाना बेहद जरूरी होगा।
शोध में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2100 तक कोसी नदी बेसिन में कुल जल उपलब्धता में 4 से 7 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। वहीं वाष्पोत्सर्जन में करीब 13 प्रतिशत की वृद्धि और भूजल पुनर्भरण में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का अनुमान है। दूसरी ओर सतही अपवाह में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे वर्षा का पानी तेजी से बह जाएगा और भूजल में उसका रिसाव कम हो जाएगा।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्रों की जल सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं को प्रभावी निर्णय लेने और जल संसाधनों, आजीविका तथा पारिस्थितिकीय संतुलन के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रणनीतियां तैयार करने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
अध्ययन में यह भी चेताया गया है कि भविष्य में इस क्षेत्र में सूखे की घटनाएं अधिक बार और लंबे समय तक देखने को मिल सकती हैं। इसका असर प्राकृतिक जल स्रोतों, कुओं, कृषि उत्पादकता और स्थानीय समुदायों की पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक स्रोतों के पुनर्जीवन, मृदा एवं जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने और प्रकृति-आधारित समाधानों को अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि यही उपाय भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सबसे प्रभावी साबित हो सकते हैं।
