मैला ढोने की प्रथा पर बेजवाड़ा विल्सन का सवाल, गरिमा और समानता पर जोर
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि अंतरिक्ष युग में पहुंचने के बावजूद देश आज भी मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म नहीं कर पाया है। उन्होंने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज भी कई राज्यों में लोग गटर में उतरकर जान जोखिम में डाल रहे हैं और इस काम में लगे लोगों का सही आंकड़ा तक उपलब्ध नहीं है।
वे उत्तराखंड इंसानियत मंच द्वारा डॉ. बी. आर. अंबेडकर की 135वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि संविधान में समानता और गरिमा की बात कही गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी एक विशेष वर्ग के लोग इस अमानवीय कार्य के लिए मजबूर हैं और सीवर हादसों में लगातार मौतें हो रही हैं।
विल्सन ने न्यायपालिका और समाज दोनों से अपेक्षित सहयोग न मिलने की बात कही। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, तो उनसे ही आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा गया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि समाज के कुछ हिस्सों ने इस लड़ाई में साथ दिया है और लोगों ने लाखों रुपये जुटाकर इस अभियान को समर्थन दिया।
कार्यक्रम में दलित चिंतक आरपी विशाल ने उत्तराखंड में जातीय भेदभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भी कई जगहों पर दलितों को मंदिर प्रवेश और समान संसाधनों तक पहुंच से वंचित रखा जाता है।
कार्यक्रम की शुरुआत सांस्कृतिक प्रस्तुति से हुई, जबकि विभिन्न वक्ताओं ने सामाजिक न्याय, समानता और भेदभाव खत्म करने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने का आह्वान किया।
