राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर नाबार्ड की पहल, मुंबई में सजी देशभर की पारंपरिक बुनाई की प्रदर्शनी
भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत के संरक्षण और पारंपरिक बुनकर समुदायों की आजीविका को सशक्त बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर 5 से 7 अगस्त 2026 तक मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) स्थित अपने प्रधान कार्यालय में प्रदर्शनी-सह-बिक्री का आयोजन किया है।
इस तीन दिवसीय आयोजन में देश की 15 प्रमुख हथकरघा परंपराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्पाद प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें महाराष्ट्र की पैठणी, तेलंगाना की पोचमपल्ली इकट, राजस्थान की कोटा डोरिया, ओडिशा की संबलपुरी, बिहार की भागलपुर सिल्क, पश्चिम बंगाल की कांथा स्टिच, गुजरात के कच्छ शॉल, आंध्र प्रदेश की वेंकटगिरि, तमिलनाडु की अरनी सिल्क, केरल की बलरामपुरम, उत्तर प्रदेश की मुबारकपुर हैंडलूम, हरियाणा की अंबाला हैंडलूम्स, मध्य प्रदेश की बाघ प्रिंट, झारखंड की भगैया सिल्क तथा कर्नाटक की उत्तरिया जैसे पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं।
प्रदर्शनी में आगंतुकों को बुनकरों और उत्पादकों से सीधे प्रामाणिक हथकरघा उत्पाद खरीदने का अवसर मिल रहा है। इस पहल का उद्देश्य कारीगरों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण हस्तनिर्मित उत्पादों तक सीधी पहुंच प्रदान करना है।
आयोजन के दौरान खरीदार-विक्रेता बैठक (Buyer-Seller Meet) का भी आयोजन किया गया, जिसमें कारीगरों, उत्पादक समूहों, संस्थागत खरीदारों और बाजार से जुड़े विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद स्थापित कर नए व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक बाजार संपर्क विकसित करने पर जोर दिया गया।
नाबार्ड लंबे समय से हथकरघा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए अपने प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से प्रदर्शनी, जन-जागरूकता कार्यक्रम और बाजार संवर्धन गतिविधियों का आयोजन करता रहा है। इसके साथ ही बैंक पारंपरिक हथकरघा उत्पादों के भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण, आजीविका विकास, कौशल उन्नयन कार्यक्रमों और ग्रामीण उद्यम उत्पादक संगठनों के माध्यम से बुनकरों के सामूहिकीकरण को भी सहयोग प्रदान कर रहा है।
बैंक का मानना है कि इन पहलों से हथकरघा उत्पादों की बाजार तक पहुंच मजबूत होती है, मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलता है और ग्रामीण क्षेत्रों में सतत आजीविका के नए अवसर सृजित होते हैं। साथ ही भारत की समृद्ध पारंपरिक बुनाई कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी बल मिलता है।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है और देश के हथकरघा बुनकरों के सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक योगदान को सम्मानित करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी सशक्त करता है।
