March 25, 2026

प्रधानमंत्री के मन की बात की 116वीं कड़ी। सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता अभियान पर बोले।

दिल्ली , मन की बात की 116वीं कड़ी में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को अपने सम्बोधन में कहा ‘मन की बात’, यानि देश के सामूहिक प्रयासों की बात, देश के युवा सपनों, देश के नागरिकों की आकांक्षाओं की बात। मैं पूरे महीने, ‘मन की बात’ का इंतजार करता रहता हूँ, ताकि, आपसे सीधा संवाद कर सकूँ। कितने ही सारे संदेश, कितने ही messages! मेरा पूरा प्रयास रहता है कि ज्यादा- से-ज्यादा संदेश को पढूँ, आपके सुझावों पर मंथन करूँ।

प्रधानमंत्री बोले, आज NCC दिवस है। NCC का नाम सामने आते ही हमें स्कूल-कॉलेज के दिन याद आ जाते हैं। मैं स्वयं भी NCC Cadet रहा हूँ, इसलिए, पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इससे मिला अनुभव मेरे लिए अनमोल है। ‘NCC’ युवाओं में अनुशासन, नेतृत्व और सेवा की भावना पैदा करती है । आपने अपने आस-पास देखा होगा, जब भी कहीं कोई आपदा होती है, चाहे बाढ़ की स्थिति हो, कहीं भूकंप आया हो, कोई हादसा हुआ हो, वहाँ, मदद करने के लिए NCC के cadets जरूर मौजूद हो जाते हैं। आज देश में NCC को मजबूत करने के लिए लगातार काम हो रहा है। 2014 में करीब 14 लाख युवा NCC से जुड़े थे। अब 2024 में, 20 लाख से ज्यादा युवा NCC से जुड़े हैं। पहले के मुकाबले पाँच हजार और नए स्कूल-कॉलेजों में अब NCC की सुविधा हो गई है, और सबसे बड़ी बात, पहले NCC में girls cadets की संख्या करीब 25% (percent) के आस-पास ही होती थी। अब NCC में girls cadets की संख्या करीब-करीब 40% (percent) हो गई है। बॉर्डर किनारे रहने वाले युवाओं को ज्यादा से ज्यादा NCC से जोड़ने का अभियान भी लगातार जारी है ।

‌ विकसित भारत के निर्माण में युवाओं का रोल बहुत बड़ा है। युवा मन जब एकजुट होकर देश की आगे की यात्रा के लिए मंथन करते हैं, चिंतन करते हैं, तो निश्चित रूप से इसके ठोस रास्ते निकलते हैं। आप जानते हैं 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर देश ‘युवा दिवस’ मनाता है । अगले साल स्वामी विवेकानंद जी की 162वीं जयंती है। इस बार इसे बहुत खास तरीके से मनाया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रवासियों का जिक्र करते हुए कहा, दुनिया के दर्जनों देशों में लाखों की संख्या में भारतीय हैं। दशकों पहले की 200-300 साल पहले की उनके पूर्वजों की अपनी कहानियां हैं। क्या आप ऐसी कहानियों को खोज सकते हैं कि किस तरह भारतीय प्रवासियों ने अलग-अलग देशों में अपनी पहचान बनाई! कैसे उन्होंने वहाँ की आजादी की लड़ाई के अंदर हिस्सा लिया! कैसे उन्होंने अपनी भारतीय विरासत को जीवित रखा? मैं चाहता हूं कि आप ऐसी सच्ची कहानियों को खोजें, और मेरे साथ share करें। आप इन कहानियों को NaMo App पर या MyGov पर #IndianDiasporaStories के साथ भी share कर सकते हैं।

साथियो ऐसा ही एक ‘Oral History Project’ भारत में भी हो रहा है। इस project के तहत इतिहास प्रेमी देश के विभाजन के कालखंड में पीड़ितों के अनुभवों का संग्रह कर रहें हैं। अब देश में ऐसे लोगों की संख्या कम ही बची है, जिन्होंने, विभाजन की विभीषिका को देखा है। ऐसे में यह प्रयास और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

प्रधानमंत्री ने स्मरण कराया, कुछ महीने पहले हमने ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान शुरू किया था। इस अभियान में देश-भर के लोगों ने बहुत उत्साह से हिस्सा लिया। मुझे ये बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि इस अभियान ने सौ करोड़ पेड़ लगाने का अहम पड़ाव पार कर लिया है। सौ करोड़ पेड़, वो भी, सिर्फ पाँच महीनों में – ये हमारे देशवासियों के अथक प्रयासों से ही संभव हुआ है। इससे जुड़ी एक और बात जानकर आपको गर्व होगा। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान अब दुनिया के दूसरे देशों में भी फैल रहा है। जब मैं गयाना में था, तो वहां भी, इस अभियान का साक्षी बना। वहां मेरे साथ गयाना के राष्ट्रपति डॉ. इरफान अली, उनकी पत्नी की माता जी, और परिवार के बाकी सदस्य, ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान में शामिल हुए।

साथियो, देश के अलग-अलग हिस्सों में ये अभियान लगातार चल रहा है। मध्य प्रदेश के इंदौर में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत, पेड़ लगाने का record बना है – यहां 24 घंटे में 12 लाख से ज्यादा पेड़ लगाए गए। इस अभियान की वजह से इंदौर की Revati Hills के बंजर इलाके, अब, green zone में बदल जाएंगे। राजस्थान के जैसलमेर में इस अभियान के द्वारा एक अनोखा record बना – यहां महिलाओं की एक टीम ने एक घंटे में 25 हजार पेड़ लगाए। माताओं ने मां के नाम पेड़ लगाया और दूसरों को भी प्रेरित किया। यहां एक ही जगह पर पाँच हज़ार से ज़्यादा लोगों ने मिलकर पेड़ लगाए – ये भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है । ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत कई सामाजिक संस्थाएँ स्थानीय जरूरतों के हिसाब से पेड़ लगा रही हैं । उनका प्रयास है कि जहां पेड़ लगाए जाएँ वहाँ पर्यावरण के अनुकूल पूरा Eco System Develop हो। इसलिए ये संस्थाएँ कहीं औषधीय पौधे लगा रहीं हैं, तो कहीं, चिड़ियों का बसेरा बनाने के लिए पेड़ लगा रहीं हैं । बिहार में ‘JEEViKA Self Help Group’ की महिलाओं ने 75 लाख पेड़ लगाने का अभियान चला रहीं हैं। इन महिलाओं का focus फल वाले पेड़ों पर है, जिससे आने वाले समय में आय भी की जा सके ।

श्री मोदी ने पर्यावरण में बदलाव के कारण चिरपरिचित पक्षियों के लुप्त होने पर चिंता जताई। देशवासियो, आप सभी लोगों ने बचपन में गौरेया या Sparrow को अपने घर की छत पर, पेड़ों पर चहकते हुए ज़रूर देखा होगा। गौरेया को तमिल और मलयालम में कुरुवी, तेलुगु में पिच्चुका और कन्नड़ा में गुब्बी के नाम से जाना जाता है। हर भाषा, संस्कृति में, गौरेया को लेकर किस्से-कहानी सुनाए जाते हैं। हमारे आसपास Biodiversity को बनाए रखने में गौरेया का एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है, लेकिन, आज शहरों में बड़ी मुश्किल से गौरेया दिखती है । बढ़ते शहरीकरण की वजह से गौरेया हमसे दूर चली गई है । आज की पीढ़ी के ऐसे बहुत से बच्चे हैं, जिन्होंने गौरेया को सिर्फ तस्वीरों या वीडियो में देखा है । ऐसे बच्चों के जीवन में इस प्यारी पक्षी की वापसी के लिए कुछ अनोखे प्रयास हो रहे हैं । चेन्नई के कूडुगल ट्रस्ट ने गौरेया की आबादी बढ़ाने के लिए स्कूल के बच्चों को अपने अभियान में शामिल किया है । संस्थान के लोग स्कूलों में जाकर बच्चों को बताते हैं कि गौरेया रोज़मर्रा के जीवन में कितनी महत्वपूर्ण है । ये संस्थान बच्चों को गौरेया का घोंसला बनाने की training देते है । इसके लिए संस्थान के लोगों ने बच्चों को लकड़ी का एक छोटा सा घर बनाना सिखाया । इसमें गौरेया के रहने, खाने का इंतजाम किया । ये ऐसे घर होते हैं जिन्हें किसी भी इमारत की बाहरी दीवार पर या पेड़ पर लगाया जा सकता है । बच्चों ने इस अभियान में उत्साह के साथ हिस्सा लिया और गौरेया के लिए बड़ी संख्या में घोंसला बनाना शुरू कर दिया । पिछले चार वर्षों में संस्था ने गौरेया के लिए ऐसे दस हज़ार घोंसले तैयार किए हैं । कूडुगल ट्रस्ट की इस पहल से आसपास के इलाकों में गौरेया की आबादी बढ़नी शुरू हो गई है। आप भी अपने आसपास ऐसे प्रयास करेंगे तो निश्चित तौर पर गौरेया फिर से हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएगी ।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान पर जोर दिया और कहा, सरकारी कार्यालयों में एक विशेष स्वच्छता अभियान चलाया गया। आपको ये जानकर खुशी होगी कि सरकारी विभागों में इस अभियान के अद्भुत परिणाम सामने आए हैं। साफ-सफाई से दफ्तरों में काफी जगह खाली हो गई है। इससे दफ्तर में काम करने वालों में एक Ownership का भाव भी आया है। अपने काम करने की जगह को स्वच्छ रखने की गंभीरता भी उनमें आई है। आपने अक्सर बड़े-बुजुर्गों को ये कहते सुना होगा, कि जहां स्वच्छता होती है, वहां, लक्ष्मी जी का वास होता है। हमारे यहाँ ‘कचरे से कंचन’ का विचार बहुत पुराना है। देश के कई हिस्सों में ‘युवा’ बेकार समझी जाने वाली चीजों को लेकर, कचरे से कंचन बना रहे हैं। तरह-तरह के।nnovation कर रहे हैं। इससे वो पैसे कमा रहे हैं, रोजगार के साधन विकसित कर रहे हैं। ये युवा अपने प्रयासों से sustainable lifestyle को भी बढ़ावा दे रहे हैं। मुंबई की दो बेटियों का ये प्रयास, वाकई बहुत प्रेरक है। अक्षरा और प्रकृति नाम की ये दो बेटियाँ, कतरन से फैशन के सामान बना रही हैं। आप भी जानते हैं कपड़ों की कटाई-सिलाई के दौरान जो कतरन निकलती है, इसे बेकार समझकर फेंक दिया जाता है। अक्षरा और प्रकृति की Team उन्हीं कपड़ों के कचरे को Fashion Product में बदलती है। कतरन से बनी टोपियां, Bag हाथों-हाथ बिक भी रही है। ऐसे प्रयासों से भारत के स्वच्छता अभियान को गति मिलती है। ये निरंतर चलते रहने वाला अभियान है। आपके आस-पास भी ऐसा जरूर होता ही होगा। आप मुझे ऐसे प्रयासों के बारे में जरूर लिखते रहिए।

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