विश्व अस्थमा दिवस 2026 : सही इनहेलर और जागरूकता की कमी बनी बड़ी चुनौती
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश के विशेषज्ञों ने विश्व अस्थमा दिवस-2026 के अवसर पर अस्थमा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों और जागरूकता की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां सामान्य लोगों के लिए यह दिवस महज एक औपचारिकता हो सकता है, वहीं देश के लगभग 3.4 करोड़ अस्थमा रोगियों के लिए यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि सांस लेना जैसी बुनियादी आवश्यकता भी अभी सभी के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकी है।
संस्थान की कार्यकारी निदेशक एवं वरिष्ठ पीडियाट्रिक्स पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा ने इस वर्ष की थीम “अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजनरोधी इनहेलर की पहुंच – अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता है” निर्धारित की है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक नारा नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौती को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अधिकांश अस्थमा मरीज केवल नीले रंग के रिलीवर इनहेलर का उपयोग करते हैं, जो अस्थमा के दौरे के समय तुरंत राहत देता है। जबकि भूरा या बैंगनी कंट्रोलर इनहेलर, जो बीमारी को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उसका उपयोग बेहद कम किया जाता है।
डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि देश में निदान किए गए अस्थमा रोगियों में से 10 प्रतिशत से भी कम मरीज इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड (ICS) उपचार प्राप्त कर रहे हैं, जबकि लंबे समय तक बीमारी को नियंत्रित रखने के लिए यही सबसे प्रभावी उपचार माना जाता है। उन्होंने कहा कि केवल रिलीवर इनहेलर पर निर्भर रहना ऐसा है जैसे आग बुझाए बिना केवल धुएं को नियंत्रित करने की कोशिश करना।
विशेषज्ञों ने “साइलेंट इन्फ्लेमेशन” को अस्थमा की बड़ी समस्या बताया। उनका कहना है कि मरीज बेहतर महसूस होते ही दवा बंद कर देते हैं, जबकि अंदरूनी सूजन बनी रहती है और अचानक गंभीर अस्थमा अटैक का खतरा बना रहता है।
एम्स विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि केवल दवा उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनहेलर का सही उपयोग भी बेहद जरूरी है। अध्ययनों के अनुसार लगभग 70 से 90 प्रतिशत मरीज इनहेलर का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते, जिसके कारण दवा फेफड़ों तक पहुंचने के बजाय गले में ही रह जाती है।
विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है, जहां प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के कारण मरीजों को सही तकनीक की जानकारी नहीं मिल पाती। इसके साथ ही बढ़ता वायु प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाला धुआं और बायोमास ईंधन का उपयोग स्थिति को और जटिल बना रहा है।
डॉ. खुशबू तनेजा ने कहा कि अस्थमा किसी व्यक्ति के जीवन को सीमित नहीं करना चाहिए, लेकिन उपचार और जागरूकता के बीच का बड़ा अंतर आज भी चुनौती बना हुआ है। उन्होंने कहा कि विश्व अस्थमा दिवस का वास्तविक उद्देश्य इसी अंतर को समाप्त करना और हर मरीज तक सही उपचार पहुंचाना है।
