मरकर भी अमर हुए शिक्षक बीएन कुकरेती, देहदान कर मानवता के लिए छोड़ गए प्रेरणादायी संदेश
जीवनभर शिक्षा का प्रकाश फैलाने वाले ऋषिकेश के वरिष्ठ शिक्षाविद और भरत मंदिर इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त शिक्षक बीएन कुकरेती ने निधन के बाद भी मानवता की ऐसी मिसाल पेश की, जो समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप परिजनों ने उनका पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं शोध कार्यों के लिए एम्स ऋषिकेश को दान कर दिया। इतना ही नहीं, उनके नेत्रदान से दो अन्य लोगों के जीवन में भी रोशनी आने की उम्मीद जगी है।
बुधवार सुबह बीएन कुकरेती का निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र शैलेश कुकरेती ने बताया कि उनके पिता ने जीवित रहते हुए 3 जून 2024 को देहदान का संकल्प लिया था और स्पष्ट इच्छा जताई थी कि निधन के बाद उनका शरीर एम्स ऋषिकेश को सौंप दिया जाए। परिवार ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए एम्स के एनाटॉमी विभाग में देहदान की प्रक्रिया पूरी कराई।
शैलेश कुकरेती ने बताया कि उनके पिता 30 जून 1996 को भरत मंदिर इंटर कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे समाज और अपने पूर्व छात्रों को अनुशासित जीवन, नैतिक मूल्यों और चरित्र निर्माण का संदेश देते रहे।
एम्स ऋषिकेश में यह देहदान संस्थान का 104वां देहदान है। संस्थान के अनुसार, पहला देहदान 27 दिसंबर 2012 को हुआ था। तब से अब तक 104 लोग चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए अपना शरीर दान कर चुके हैं। मेडिकल छात्रों के अध्ययन, अनुसंधान और चिकित्सीय प्रशिक्षण में देहदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
देहदान की प्रक्रिया के दौरान एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने परिजनों को सम्मानित किया और इस महान कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में देहदान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और यह मानव सेवा का सर्वोच्च रूप है। उन्होंने देहदान को “सबसे बड़ा दान और सबसे बड़ा धर्म” बताया।
इस अवसर पर एनाटॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. मुकेश सिंगला, डॉ. राजू बोकन तथा तकनीकी सहायक अजय रावत सहित अन्य चिकित्सक एवं कर्मचारी मौजूद रहे।
डॉ. राजू बोकन ने बताया कि देहदान के साथ-साथ बीएन कुकरेती के कॉर्निया (नेत्र) भी सफलतापूर्वक सुरक्षित निकालकर नेत्र बैंक में संरक्षित कर लिए गए हैं। इन कॉर्निया के प्रत्यारोपण से दो दृष्टिबाधित लोगों को नई रोशनी मिल सकेगी।
बीएन कुकरेती का यह निर्णय न केवल चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा देगा, बल्कि समाज में देहदान और अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी प्रेरणादायी संदेश देगा। उनका जीवन जहां शिक्षा के लिए समर्पित रहा, वहीं उनका देहदान मानवता की सेवा का अमिट उदाहरण बन गया।
