September 6, 2026

हरेला: हरियाली, पर्यावरण संरक्षण और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का लोकपर्व

Harela

सरोवर नगरी नैनीताल समेत पूरे उत्तराखंड में प्रकृति और हरियाली के प्रतीक लोकपर्व हरेला की धूम देखने को मिल रही है। पर्यावरण संरक्षण, कृषि परंपरा और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला यह पर्व प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इस अवसर पर लोग पौधारोपण कर प्रकृति के संरक्षण का संकल्प भी लेते हैं।

वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने बताया कि हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति निष्ठा, समर्पण और हरियाली के संरक्षण का संदेश देने वाला लोकपर्व है। उन्होंने कहा कि हरेला मानसून के आगमन और कृषि चक्र की शुरुआत का प्रतीक है, जो लोगों को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए प्रेरित करता है।

उन्होंने बताया कि हरेला की शुरुआत मिट्टी से भरी टोकरी में पांच या सात प्रकार के अनाज—जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, धान, सरसों आदि—बोने से होती है। नौ दिन बाद जब ये अंकुरित होकर हरे-भरे हो जाते हैं तो उन्हें काटकर सबसे पहले कुलदेवता को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग हरेला को बच्चों और अन्य सदस्यों के सिर पर रखकर सुख, समृद्धि, दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।

डॉ. तिवारी ने बताया कि हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। पहला चैत्र माह में, दूसरा श्रावण माह में और तीसरा आश्विन माह में। इनमें श्रावण मास का हरेला सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देता है—चैत्र में गर्मी, श्रावण में वर्षा और आश्विन में शीत ऋतु के आगमन का संदेश।

उन्होंने कहा कि हरेला पर्व पौधारोपण, जल संरक्षण, मिट्टी के कटाव को रोकने और भूजल स्तर बढ़ाने की प्रेरणा देता है। पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हरेला आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और हरित पर्यावरण का संकल्प भी है।

डॉ. तिवारी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी कारण हरेला का पर्व शिव-पार्वती की पूजा और अच्छी फसल की कामना से भी जुड़ा हुआ है। लोक परंपरा के अनुसार लोग मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं, जिन्हें ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर उनकी पूजा करते हैं और अच्छी वर्षा, समृद्धि तथा खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।

उन्होंने कहा कि हरेला उत्तराखंड की हिमालयी संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति आस्था का जीवंत प्रतीक है। इस अवसर पर पारंपरिक आशीर्वाद—“जी रया, जागि रया, दुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो, हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया”—के साथ परिवार के बड़े अपने छोटों के सुखद, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करते हैं।

विभागाध्यक्ष डॉक्टर ललित तिवारी

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