आईआईटी रुड़की के शोध में दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की बड़ी कमजोरी का खुलासा, नए उपचार की उम्मीद जगी
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे खतरनाक अस्पताल-जनित बैक्टीरिया की महत्वपूर्ण चयापचयीय कमजोरी का पता लगाया है, जो भविष्य में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों के उपचार के लिए नई राह खोल सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि Acinetobacter baumannii नामक रोगजनक अपने अस्तित्व और संक्रमण फैलाने के लिए जिन चयापचय मार्गों पर निर्भर करता है, उन्हें एक साथ बाधित करने पर उसकी जीवित रहने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
यह अध्ययन आईआईटी रुड़की के जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग की प्रोफेसर रंजना पठानिया के नेतृत्व में किया गया। शोध कार्य पीएचडी शोधार्थी अविक पाठक और पोस्टडॉक्टोरल फेलो डॉ. स्नेहलता सैनी ने पूरा किया। अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका mBio में प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार Acinetobacter baumannii दुनिया भर में अस्पताल-जनित संक्रमणों का प्रमुख कारण बन चुका है। यह जीवाणु अस्पतालों के वातावरण में लंबे समय तक जीवित रहने और कई प्रकार की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोध विकसित करने की क्षमता रखता है। इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कार्बापेनेम-प्रतिरोधी Acinetobacter baumannii को सर्वोच्च प्राथमिकता वाले रोगजनकों की सूची में शामिल किया है।
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सिस्टीन चयापचय की भूमिका का विश्लेषण किया। सिस्टीन एक महत्वपूर्ण अमीनो अम्ल है, जो जीवाणु की विभिन्न कोशिकीय प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक होता है। शोध में पता चला कि यह जीवाणु सिस्टीन के निर्माण के लिए CysE और SAT नामक दो आंशिक रूप से अतिरिक्त एंजाइमों पर निर्भर करता है। जब इन मार्गों को बाधित किया गया तो कोशिकाओं में सिस्टीन का स्तर तेजी से घट गया, जिससे ऊर्जा उत्पादन प्रभावित हुआ, ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ा और जीवाणु पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जीवाणु सिस्टीन के ऑक्सीकृत रूप ‘सिस्टीन’ (Cystine) को अवशोषित करके इस कमी की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है। हालांकि, जब सिस्टीन जैवसंश्लेषण और अवशोषण दोनों मार्गों को एक साथ अवरुद्ध किया गया, तो जीवाणु में ‘सिंथेटिक लेथैलिटी’ की स्थिति उत्पन्न हो गई, जिससे उसकी जीवित रहने और संक्रमण स्थापित करने की क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक प्रोफेसर रंजना पठानिया ने कहा कि शोध से स्पष्ट होता है कि Acinetobacter baumannii अपनी चयापचयीय क्षमता बनाए रखने के लिए सिस्टीन जैवसंश्लेषण और अवशोषण के संतुलित नेटवर्क पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि दोनों प्रणालियों में एक साथ हस्तक्षेप करने से जीवाणु के अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिससे बहु-दवा प्रतिरोधी संक्रमणों के खिलाफ नई संयोजन-आधारित उपचार रणनीतियों के विकास की संभावनाएं बढ़ती हैं।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह शोध जीवाणुओं के जीवित रहने के तंत्रों की समझ को और गहरा करता है तथा ऐसे उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों की कमजोरियों को सीधे निशाना बना सकें।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन न केवल जीवाणु शरीरक्रिया विज्ञान और उसकी अनुकूलन क्षमता को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य में ऐसी प्रभावी उपचार रणनीतियों के विकास का आधार भी बनेगा, जो बढ़ते रोगाणुरोधी प्रतिरोध की वैश्विक चुनौती से निपटने में सहायक सिद्ध होंगी।
