परमार्थ निकेतन में संत समागम, राष्ट्र और संस्कृति पर मंथन
परमार्थ निकेतन में शनिवार को आध्यात्मिकता, राष्ट्रभक्ति, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के परमार्थ निकेतन आगमन पर संत समाज, जनप्रतिनिधियों और गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम में पुष्कर सिंह धामी, महेंद्र भट्ट, मदन कौशिक, धन सिंह रावत, विनय रोहेला तथा रेणु बिष्ट सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
इस अवसर पर स्वामी अवधेशानंद गिरि, स्वामी रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी कैलाशानंद, महंत रविंद्र पुरी, साध्वी भगवती सरस्वती तथा आचार्य बालकृष्ण सहित अनेक संत-महात्माओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
अपने संबोधन में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि गंगा तट पर पहुंचते ही मन में शांति और पवित्रता का भाव जागृत हो जाता है। उन्होंने कहा कि संत समाज ने हजारों वर्षों से सनातन परंपराओं को जीवंत बनाए रखा है और कठिन परिस्थितियों में भी देश को दिशा देने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि जब तक गंगा की अविरल धारा प्रवाहित होती रहेगी, तब तक भारतीय संस्कृति, परंपराएं और संतों का आशीर्वाद देश को मिलता रहेगा।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत की आत्मा उसकी आध्यात्मिकता में बसती है। जब संत, शासन, समाज और युवा शक्ति राष्ट्रहित में एकजुट होकर कार्य करते हैं, तब एक सशक्त, समृद्ध और संस्कारित भारत का निर्माण संभव होता है। उन्होंने विकास और विरासत को साथ लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि गंगा तटों ने पूरे विश्व को ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का संदेश दिया है।
संतों ने अपने विचारों में भारत की सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्र निर्माण में संत समाज की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की तपोभूमि है, जहां आध्यात्मिकता और राष्ट्रभाव एक-दूसरे के पूरक हैं।
कार्यक्रम के अंत में स्वामी चिदानंद सरस्वती ने सभी विशिष्ट अतिथियों और संत-महात्माओं का रुद्राक्ष के पौधे भेंट कर सम्मान किया तथा पर्यावरण संरक्षण और हरित भारत के संदेश को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
