June 17, 2026

सरकार की जिम्मेदारी है कि वो तय करे कि सार्वजनिक़ओ संपत्ति पर सभी व्यक्तियों और समुदायों को बराबर हक दिलाएं: इलाहाबाद हाई कोर्ट,

Prayagraj, 02 April 2026,

सार्वजनिक सम्पत्ति पर सामूहिक नमाज पढ़ने की एक याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है । कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, सार्वजनिक स्थान और सम्पत्तियां नमाज के लिए ही नहीं बल्कि सभी के इस्तेमाल के लिए होती है। कोई भी व्यक्ति या पक्ष, अपने लिए इसे बार-बार धार्मिक जगह के रूप में इस्तेमाल करने का हक नहीं मांग सकता है। इसमें सरकार की जिम्मेदारी है कि वो तय करे कि ऐसी संपत्ति पर सभी व्यक्तियों और समुदायों को बराबर हक दिलाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर परंपरा के खिलाफ जाकर कोई काम किया जाता है तो राज्य सरकार को उसमें हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। हाई कोर्ट की जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस याचिका सुनवाई की है।

ये मामला असीन बनाम राज्य सरकार के एक मुकदमे से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने गिफ्ट में मिली यूपी के संभल जिले के इकौना गांव स्थित एक जमीन पर दावा किया कि, उसकी निजी संपत्ति में उसे नमाज पढ़ने से रोका जा रहा है। याचिकाकर्ता ने पहले दिए कुछ फैसलों का हवाला दिया और कहा कि अदालत ने पहले भी साफ किया है कि निजी संपत्ति पर बिना सरकारी अदद के नमाज अदा की जा सकती है‌। राज्य सरकार ने इस याचिका का ये कहते हुए विरोध किया कि पहले तो वह जमीन सरकारी दस्तावेजों में ‘आबादी जमीन’ के तौर पर दर्ज है। यानी वह सार्वजनिक संपत्ति है। उस पर याचिकाकर्ता का कोई मालिकाना हक नहीं है। इसके अलावा, जिस जगह पर नमाज रोकने की बात कही जा रही है, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेद एक की रिपोर्ट के अनुसार वहां पहले से सिर्फ ईद के मौके पर ही नमाज पढ़ी जाती रही है। इस पर कभी कोई रोक नहीं लगाई गई, लेकिन याचिकाकर्ता असीन गांव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर नियमित रूप से बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज शुरू करने धार्मिक प्रथाओं का सम्मान किया जाएगा, लेकिन कोई नई परंपरा या गैर-पारंपरिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने ये भी कहा कि हिंदू त्योहारों, जैसे होलिका दहन के लिए भी साफ निर्देश हैं कि ऐसे कार्यक्रम सिर्फ पहले से तय जगहों पर ही किए जाएंगे।उन्हें सड़कों या नई जगहों पर करने की अनुमति नहीं है।

कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद ये कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि जमीन पर याचिकाकर्ता का कोई कानूनी अधिकार साबित नहीं होता. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी के आधार पर कोर्ट ने पाया कि जिस जमीन की बात हो रही है, वह सार्वजनिक जमीन के रूप में दर्ज है. मालिकाना हक का दावा सिर्फ 16 जून 2023 की एक कथित ‘गिफ्ट डीड’ पर आधारित है, जिसमें गाटा या खाता नंबर जैसी जरूरी जानकारी नहीं है. सिर्फ ऐसी सीमाओं का जिक्र है, जो साफ नहीं हैं. इससे कोई पक्का मालिकाना हक साबित नहीं होता.

कोर्ट ने कहा कि अगर जमीन निजी भी होती, तब भी याचिकाकर्ता को नई परंपरा डालने की इजाजत नहीं दी जा सकती। रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ताऑ पुरानी परंपरा को जारी नहीं रख रहा है और गांव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर सामूहिक नमाज शुरू करना चाहता है। ये कृत्य निजी दायरे से बाहर है और उस पर लागू हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जमीन सबके इस्तेमाल के लिए होती है। कोई खास व्यक्ति या समूह उस पर अपना दावा नहीं कर सकता है । कोर्ट के मुताबिक, किसी भी धार्मिक परंपरा को शुरू करने से अगर सामाजिक संतुलन बिगड़ने की संभावना हो तो सरकार ऐक्शन ले सकती है. उसे किसी गड़बड़ी के होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. वह इसमें पहले से ही उचित कदम उठा सकती है।

Share
Copyright2017©Spot Witness Times. Designed by MTC, 9084358715. All rights reserved. | Newsphere by AF themes.