यौन अपराधों से संबंधित मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और कानूनी समझ का होना अत्यंत आवश्यक: सुप्रीम कोर्ट
Delhi 15 July 2026,
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक संवेदनशीलता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि कोर्ट इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों के पीड़ितों के प्रति अदालतों के दृष्टिकोण को अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) द्वारा तैयार व्यापक दिशानिर्देशों को देशभर में प्रसारित करने का निर्देश दिया।
पटना हाई कोर्ट के गत दिनों यौन अपराधों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों से संबंधित मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और कानूनी समझ का होना अत्यंत आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने से पहले न्यायाधीशों को उचित शोध और स्थापित कानूनी सिद्धांतों का ध्यान रखना चाहिए।
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता में यह मामला प्रस्तुत किया गया। सुनवाई के दौरान, अदालत ने पटना हाई कोर्ट की उस टिप्पणी पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि महिला की सलवार उतारने का प्रयास और उसकी छाती दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिलाओं से संबंधित मामलों में अदालतों को विशेष संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए जो न्यायिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाएं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने आदेश दिया कि इस रिपोर्ट को देश के सभी उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, राज्य विधि विभागों और अभियोजन निदेशालयों को भेजा जाए।
पीठ ने सभी अभियोजन निदेशालयों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि ये दिशानिर्देश संबंधित सभी अधिकारियों तक पहुंचाए जाएं। साथ ही पुलिसकर्मियों को इस बात के प्रति संवेदनशील बनाया जाए कि यौन अपराध के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करते समय और आरोपपत्र दाखिल करते समय किन सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने इस रिपोर्ट को ‘एक उल्लेखनीय रिपोर्ट’ और ‘टीम का सराहनीय प्रयास’ करार दिया, साथ ही भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के कार्य की प्रशंसा की। यह निर्देश वर्ष 2025 में एक मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए शुरू की गई कार्यवाही से जुड़े हैं।
यह कार्यवाही इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले के बाद शुरू हुई थी, जिसमें कहा गया था कि एक नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलने का प्रयास करना केवल बलात्कार की ‘तैयारी’ है, न कि ‘बलात्कार का प्रयास’। इस असंवेदनशील फैसले की व्यापक आलोचना हुई थी और बाल अधिकार संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ ने इसे चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च को यौन अपराधों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक आदेशों में इस्तेमाल की जाने वाली असंवेदनशील भाषा और शब्दावली पर भी स्वत: संज्ञान लिया था। बाद में न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि यह ‘स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण’ है और आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने उस मामले में आरोपी के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत बलात्कार के प्रयास का आरोप फिर से बहाल कर दिया।
