उत्तराखंड में पलायन वापसी के प्रयासों को मिल रहा बल, 44 प्रतिशत वृद्धि बनी उम्मीद की किरण
उत्तराखंड में पलायन की चुनौती के बीच गांवों की ओर वापसी के आंकड़ों में करीब 44 प्रतिशत की वृद्धि को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। प्रदेश सरकार की ओर से पलायन रोकने और प्रवासियों को अपने मूल गांवों से जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नई दिल्ली में प्रवासी उत्तराखंडियों के साथ बैठक कर इस विषय पर विस्तृत मंथन किया। सरकार का जोर रोजगार, आजीविका और मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के जरिए पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों की वापसी का आधार तैयार करने पर है।
उत्तराखंड में पलायन की समस्या सबसे अधिक सीमांत और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिली है। लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं की कमी, रोजगार एवं आजीविका के सीमित अवसर और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने अपने गांव छोड़कर शहरों और मैदानी क्षेत्रों का रुख किया। लगातार जारी रहे इस पलायन का असर कई गांवों पर इतना पड़ा कि वे धीरे-धीरे जनशून्य हो गए।
पौड़ी और अल्मोड़ा सबसे अधिक प्रभावित जिलों में
पलायन से पौड़ी और अल्मोड़ा जैसे पर्वतीय जिले विशेष रूप से प्रभावित रहे हैं। हालांकि, अब दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क के साथ ही बिजली, पेयजल, इंटरनेट और अन्य आवश्यक अवस्थापना सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं।
इन प्रयासों का उद्देश्य गांवों में स्थानीय स्तर पर आजीविका के साधन विकसित करना और उन लोगों को वापस लौटने के लिए प्रोत्साहित करना है, जो बेहतर रोजगार और सुविधाओं की तलाश में बाहर चले गए थे। गांवों में वापसी के आंकड़ों में हुई वृद्धि को इसी दिशा में एक सकारात्मक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर देना होगा विशेष ध्यान
हालांकि पलायन की रफ्तार कम करने और वापसी को स्थायी बनाने के लिए केवल सड़क और रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं होंगे। पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को मजबूत करना भी जरूरी है। वर्तमान में कई दूरस्थ क्षेत्रों में प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक विद्यालय तो संचालित हो रहे हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं और अन्य संसाधनों का अभाव विद्यार्थियों और अभिभावकों के सामने चुनौती बना हुआ है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कई दूरस्थ क्षेत्रों में इसी तरह की है। अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद विशेषज्ञ चिकित्सकों, आधुनिक उपकरणों और पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण लोगों को उपचार के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
एकीकृत नीति से ही स्थायी समाधान की उम्मीद
पलायन की समस्या बहुआयामी है, इसलिए इसके समाधान के लिए भी एकीकृत और समावेशी नीति की आवश्यकता है। रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार, पेयजल और अन्य जन सेवाओं की उपलब्धता तथा उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी। यदि सरकार इन सभी पहलुओं को समन्वित तरीके से धरातल पर उतारती है तो पर्वतीय गांवों में आबादी को बनाए रखने के साथ ही प्रवासियों की स्थायी वापसी के लिए भी बेहतर माहौल तैयार किया जा सकता है।
