ईडी की छापेमारी में बाधा डालने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस कृत्य को “लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला” और “असाधारण” स्थिति बताया,
Delhi 22 April 2026,
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की 8 जनवरी 2026 को आई-पैक (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) के सह संस्थापक प्रतीक जैन के घर पर प्रवर्तन निदेशालय ईडी की छापेमारी में बाधा डालने के लिए कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस कृत्य को “लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला” और “असाधारण” स्थिति बताया।
सुप्रीम में जस्टिस पीके मिश्रा और एनवी अंजारी की पीठ ने कहा, “यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है। किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री जांच के बीच में आकर लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकता है। और फिर यह नहीं कह सकता कि यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद है। यह अपने आप में एक ऐसा कृत्य है जो लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला” और “असाधारण” है।
कोर्ट ने आगे कहा कि देश के कानून के दिग्गज भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते थे। कोर्ट ने ममता बनर्जी के अधिवक्ता से कहा, “आपने हमें केशवानंद भारती और सीरवाई के बारे में बताया है। लेकिन उनमें से किसी ने भी इस स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि इस देश में एक दिन ऐसा भी आएगा जब एक मौजूदा मुख्यमंत्री किसी अन्य एजेंसी के कार्यालय में जाएगा और जांच करवाई को बाधित करने की कोशिश करेगा।
ईडी ने जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल और दिल्ली में 10 परिसरों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। यह अनुप मजी के नेतृत्व में कथित तौर पर चल रहे कोयला तस्करी गिरोह से जुड़े धन शोधन की जांच के सिलसिले में था। तलाशी में आई-पैक का ऑफिस और तृणमूल कांग्रेस पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार प्रतीक जैन का आवास भी शामिल था। तलाशी अभियान के तहत ईडी प्रतीक के आवास पर छापेमारी कर रही थी, तभी ममता बनर्जी अचानक सुरक्षाकर्मियों के साथ मौके पर पहुंच गईं। इससे केंद्रीय अधिकारियों के साथ तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई। जांच एजेंसी ने ममता बनर्जी पर दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत ले जाने के तथाकथित आरोप लगाए।
पूर्व डीजीपी राजीव कुमार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनुसिंघवी ने कहा कि ईडी के पास जांच करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है और न ही उसके अधिकारियों को ऐसा कोई विशेष अधिकार प्राप्त है। सिंघवी ने कहा, ईडी जो सीधे नहीं कर सकते, उसे परोक्ष रूप से भी नहीं कर सकते। उन्होंने आगे कहा कि ‘पैरेंस पैट्रिया’ (राज्य का संरक्षक के रूप में कार्य करना) का सिद्धांत आपराधिक जांच में लागू नहीं होता।
कोर्ट ने पूछा कि ‘डायरेक्ट-इनडायरेक्ट का सिद्धांत प्रशासनिक कानून में लागू होता है या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की याचिकाओं में भी?’ इस पर सिंघवी ने कहा कि यह दोनों ही मामलों में लागू होता है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी अपनी दलीलें पेश की. उन्होंने संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए अनुच्छेद 32 की व्याख्या पर जोर दिया। इस दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने आपत्ति जताई कि पहले ही कपिल सिब्बल ममता बनर्जी का पक्ष रख चुके हैं। गुरुस्वामी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत एक पक्ष के लिए दो वकील पेश हो सकते हैं।
वहीं बनर्जी का कहना है कि ये दस्तावेज और आंकड़े उनकी राजनीतिक पार्टी से संबंधित हैं। उन्होंने जांच एजेंसी पर उन्हें और तृणमूल कांग्रेस पार्टी को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने छापों को राजनीतिक प्रतिशोध का एक घिनौना प्रयास बताया।
जांच एजेंसी का कहना है कि तलाशी पूरी तरह से सबूतों पर आधारित है और किसी भी राजनीतिक प्रतिष्ठान या पार्टी कार्यालय को निशाना नहीं बनाया गया है। कलकत्ता हाई कोर्ट से तत्काल राहत न मिलने के बाद ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। यहां उसने बनर्जी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों की कथित तौर पर कोलकाता में छापेमारी में बाधा डालने की भूमिका की सीबीआई जांच की मांग की थी। फिलहाल मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट जारी है।
